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आज षटतिला एकादशी है। सनातन धर्म में एकादशी व्रत का अधिक महत्व है। माघ माह के कृष्ण पक्ष में पड़नेवाली एकादशी को षटतिला एकादशी कहते हैं। इस एकादशी को व्रत के साथ-साथ भगवान को तिल का भोग लगाना चाहिए। इस दिन तिल का दान करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है। अपने प्रसाद में भी तिल की सामग्री का सेवन करना चाहिए। इस दिन चावल का त्याग करना चाहिए। षटतिला एकादशी के दिन व्रत रखकर घर पर हरिनाम संकीर्तन करना चाहिए। यही एक व्रत है, जो मनुष्य को मोक्ष के द्वार तक ले जाती है। एकादशी व्रत पारण अगले दिन किया जाता है। षटतिला एकादशी व्रत का पारण 19 जनवरी को किया जाएगा। धार्मिक मान्याताओं के अनुसार एकादशी व्रत पर व्रत कथा का पाठ जरूर करना चाहिए।

पारण (व्रत तोड़ने का) समय – 19 नवंबर,  07:02 ए एम से 09:09 ए एम

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एकादशी व्रत कथा का पाठ करने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है और मृत्यु के पश्चात मोक्ष की प्राप्ति होती है। आगे पढ़ें एकादशी व्रत कथा….

षटतिला एकादशी की कथा:  वस्तुतः एकादशी तो मोक्ष का व्रत है, लेकिन विशेषकर षटतिला एकादशी दान का व्रत है, क्योंकि इस दिन किया गया दान न सिर्फ भौतिक जीवन में अपितु बैकुंठ में भी वैभव से परिपूर्ण करता है। षटतिला एकादशी की कथा है कि एक ब्राह्मणी भगवान विष्णु की अनन्य भक्त थी। प्रत्येक माह एकादशी का व्रत कर विष्णु की उपासना करती थी। लेकिन दान नहीं करने की वजह से भगवान यह सोच कर चिंतित हुए कि बैकुंठ में रहकर भी यह ब्राह्मणी आतृप्त रहेगी, इसलिए भगवान विष्णु स्वयं भिक्षा लेने उनके घर पहुंचे। लेकिन दान में ब्राह्मणी ने एक मिट्टी का पात्र दे दिया। देहावसान के बाद जब वह बैकुंठ पहुंची, तो उसे इसका अहसास हुआ। बाद में उसने बैकुंठ में रहकर ही षटतिला एकादशी का व्रत किया।



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