रत्नों की शक्ति: रत्नों में अद्भूत शक्ति होती है. रत्न अगर किसी के भाग्य को आसमन पर पहुंचा सकता है तो किसी को आसमान से ज़मीन पर लाने की क्षमता भी रखता है. रत्न के विपरीत प्रभाव से बचने के लिए सही प्रकर से जांच करवाकर ही रत्न धारण करना चाहिए. ग्रहों की स्थिति के अनुसार रत्न धारण करना चाहिए. रत्न धारण करते समय ग्रहों की दशा एवं अन्तर्दशा का भी ख्याल रखना चाहिए. रत्न पहनते समय मात्रा का ख्याल रखना आवश्यक होता है. अगर मात्रा सही नहीं हो तो फल प्राप्ति में विलम्ब होता है.

किस रत्न को धारण करना चाहिए: जन्म कुंडली में जो ग्रह निर्बल तथा अशुभ फल देने वाला हो उसे प्रसन्न करने के लिए उस ग्रह का रत्न विधिवत धारण करने का उपदेश शास्त्रों में किया गया है। जिस ग्रह कि विंशोत्तरी महादशा या अंतर्दशा हो और वह अस्त, नीच या शत्रु राशिस्थ, लग्न से 6, 8या 12वें भाव में हो, पाप ग्रह से युक्त या दृष्ट हो, षड्बल विहीन हो, उस के रत्न को विधि अनुसार धारण करने से वह अपने अशुभ फल को त्याग कर शुभ फल प्रदान करता है।

जन्म कुंडली के विभिन्न लग्नादि भावों के स्वामी ग्रहों से सम्बंधित रत्न धारण करने से उस भाव से सम्बंधित शुभ फलों कि प्राप्ति होती है। जैसे लग्न के स्वामी अर्थात लग्नेश ग्रह से सम्बंधित रत्न धारण करने से आरोग्यता, दीर्घायु, सुख भोगने कि क्षमता प्राप्त होती है। पंचम भाव के स्वामी अर्थात पंचमेश से सम्बंधित रत्न धारण करने से विद्या, बुद्धि कि प्रखरता तथा संतान सुख में वृद्धि होती है।

किन ग्रहों के रत्न पहने जाएँ : सामान्यत: रत्नों के बारे में भ्रांति होती है, जैसे विवाह न हो रहा हो तो पुखराज पहन लें, मांगलिक हो तो मूँगा पहन लें, गुस्सा आता हो तो मोती पहन लें। मगर कौन सा रत्न कब पहना जाए इसके लिए कुंडली का सूक्ष्म निरीक्षण जरूरी होता है। लग्न कुंडली, नवमांश, ग्रहों का बलाबल, दशा-महादशाएँ आदि सभी का अध्ययन करने के बाद ही रत्न पहनने की सलाह दी जाती है। यूँ ही रत्न पहन लेना नुकसानदायक हो सकता है। मोती डिप्रेशन भी दे सकता है, मूँगा रक्तचाप गड़बड़ा सकता है और पुखराज अहंकार बढ़ा सकता है, पेट गड़बड़ कर सकता है।

सामान्यत: लग्न कुंडली के अनुसार कारकर ग्रहों के (लग्न, नवम, पंचम) रत्न पहने जा सकते हैं जो ग्रह शुभ भावों के स्वामी होकर पाप प्रभाव में हो, अस्त हो या शत्रु क्षेत्री हो, उन्हें प्रबल बनाने के लिए भी उनके रत्न पहनना प्रभाव देता है।

रत्न पहनने के लिए दशा– महादशाओं का अध्ययन भी जरूरी है। केंद्र या त्रिकोण के स्वामी की ग्रह महादशा में उस ग्रह का रत्न पहनने से अधिक लाभ मिलता है।

3, 6, 8, 12 के स्वामी ग्रहों के रत्न नहीं पहनने चाहिए। इनको शांत रखने के लिए दान-मंत्र जाप का सहारा लेना चाहिए। रत्न निर्धारित करने के बाद उन्हें पहनने का भी विशेष तरीका होता है। रत्न अँगूठी या लॉकेट के रूप में निर्धारित धातु (सोना, चाँदी, ताँबा, पीतल) में बनाए जाते हैं। उस ग्रह के लिए निहित वार वाले दिन शुभ घड़ी में रत्न पहना जाता है। इसके पहले रत्न को दो दिन कच्चे दूध में भिगोकर रखें। शुभ घड़ी में उस ग्रह का मंत्र जाप करके रत्न को सिद्ध करें। (ये जाप 21 हजार से 1 लाख तक हो सकते हैं) तत्पश्चात इष्ट देव का स्मरण कर रत्न को धूप-दीप दिया तो उसे प्रसन्न मन से धारण करें। इस विधि से रत्न धारण करने से ही वह पूर्ण फल देता है। मंत्र जाप के लिए भी रत्न सिद्धि के लिए किसी ज्ञानी की मदद भी ली जा सकती है। शनि और राहु के रत्न कुंडली के सूक्ष्म निरीक्षण के बाद ही पहनना चाहिए अन्यथा इनसे भयंकर नुकसान भी हो सकता है।

 

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