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शरद पूर्णिमा पर रविवार को चंद्रमा अपनी 16 कलाओं की छटा बिखेरेगा। शरद पूर्णिमा का सनातन धर्म में काफी महत्व है पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इसी दिन समुद्र मंथन के द्वारा देवी लक्ष्मी का प्राकट्य हुआ था। मान्यता है की शरद पूर्णिमा की रात्रि आसमान से अमृत की बूंदें बरसती हैं। इसलिए तो शरद पूर्णिमा की चांदनी रात में खुले आसमान के नीचे खीर रखने की परंपरा है। मान्यता है कि अगली सुबह जो भी प्राणी अमृत युक्त इस खीर का सेवन करता है वह तमाम रोग व व्याधियों से मुक्त होता है। भले ही पूर्णिमा एक हो लेकिन इस उत्सव को अलग- अलग समाज इसे अलग- अलग रुप में अलग – अलग नाम से मनाता है।

बंगाली समाज का लक्खी पूजा : शरद पूर्णिमा पर विशेष कर बंगाली समुदाय के लोग इसे लक्खी पूजा के रूप में मनाते हैं। रविवार को सभी देवी मंदिरों में जहां जहां मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित की गई थी वहां मां लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित कर पूजा अर्चना की जाएगी। हरि मंदिर, हीरापुर दुर्गा मंडप, कोयला नगर दुर्गा मंडप, जगधात्री क्लब सहित तमाम मंडप पर महिलाएं माता लक्ष्मी की पूजा करेंगी।

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मिथिलांचलवासी मनाएगें कोजागरा :

शरद पूर्णिमा मिथिलांचलवासी कोजागरा पर्व के रुप में मनाते हैं। कोजागरा पर्व पर मधुर, मखान और पान का विशेष महत्व होता है। नवविवाहिता कन्या के घर से वर पक्ष के घर पर कोजागरा के लिए पूर्व में ही पान, मखान केला, दही, मिठाई, लड्डू, नए कपड़े, हल सहित कई तरह की सामग्रियां और वस्त्र आदि भेंट किए जाते हैं। इस मौके पर नवविवाहित वर वधू की सुख शांति के लिए घर में पूजा अर्चना करेंगी। इस पर्व के लिए महिलाएं पूरे दिन निर्जला उपवास कर संध्या में मां लक्ष्मी की पूजा अर्चना करती हैं।

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गुजराती समाज शरद पुनम तो वैष्णव का रास पूर्णिमा : गुजराती समाज इसे शरद पुनम के रुप में मनाता है। समाज के वरिष्ठ भुजंगी पंड्या ने बताया कि गुजराती संस्कृति के अनुसारी रात्री में सामुहिक रुप से खुले मैदान में तो वहीं परिवार के लिए अपनी – अपनी छतों पर जुटेंगे। यहां गर्म दुध में चीनी और चूडा डालकर खुले आसमान के नीचे चंद्रमा की रौशनी में रख देते हैं। जब तक चंद्रमा की ठंडक उस खीर में पड़ती है, तब तक कृष्ण के भजनों पर उसी के चारों ओर रास-गरबा होता है। वहीं इस्कॉन धनबाद के उपाध्यक्ष दामोदर गोविंद दास ने बताया कि यह मास सर्वश्रेष्ठ है। शरद पूर्णिमा पर इस्कॉन में दीप दान का अनुष्ठान होगा। शरद पूर्णिमा की चांदनी में ही ठाकुरजी ने गोपियों संग रास रचाया था। इसलिए ब्रज में इसे रास पूर्णिमा कहते हैं।

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