sharad purnima

शरद पूर्णिमा

जब चन्द्रकिरणों से बरसता है अमृत


आपको आपके परिवार को आज के पावन पर्व की बहुत बहुत शुभकामनाएं।

आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा शरद पूर्णिमा (शरत्पूर्णिमा) कहलाती है । इस दिन चन्द्रमा पृथ्वी के बहुत पास आ जाता है, इसलिए यह सारी ही पूर्णिमाओं से अधिक दमकती है । कहते हैं कि इस दिन चन्द्रमा की चांदनी में अमृत का निवास रहता है, चन्द्र-किरणों से अमृत की वर्षा होती है, इसलिए इस दिन चन्द्रकिरणों से अमृत और आरोग्य की प्राप्ति होती है ।

पुरुषसूक्त में एक ऋचा है–

‘चन्द्रमा मनसो जात:’

अर्थात् परमब्रह्म परमात्मा के मन से चन्द्रमा की उत्पत्ति हुई है । चन्द्रमा शीतल है, इसलिए शरद पूर्णिमा को जब चन्द्रमा पूर्ण होता है तो चन्द्रमा की चांदनी में बैठने से मनुष्य का तन-मन शांत और त्रिविध दोषों से मुक्ति मिल जाती है ।

भगवान श्रीकृष्ण ने शरद पूर्णिमा के दिन रासलीला की थी इसलिए व्रज में इस पर्व को बहुत उत्साह के साथ मनाया जाता है और इसे रासोत्सव और कौमुदीमहोत्सव भी कहते हैं ।

शरद पूर्णिमा पर कैसे करें भगवान का पूजन ?

शरद पूर्णिमा को प्रात:काल भगवान का पंचोपचार या षोडशोपचार पूजन कर सफेद वस्त्र और पुष्पों से उनका श्रृंगार करना चाहिए । शरद पूर्णिमा को भगवान श्रीकृष्ण ने यमुना तट पर पूर्ण चन्द्रमा की चांदनी में महारास किया था । इस भाव से रात्रि में घर के आंगन में या जहां चन्द्रकिरणें आती हों वहां लड्डूगोपाल या जो भी भगवान की प्रतिमा हो, उसे सुन्दर सफेद बिछावन करके चन्द्रमा की चांदनी में पधराया जाता है ।

दोपहर में हाथियों का पूजन करने से उत्तम फल की प्राप्ति होती है ।

मध्य रात्रि में जब पूर्ण चन्द्रमा आकाश में स्थित हो उस समय उनका पूजन कर अर्घ्य प्रदान करना चाहिए ।

इस दिन कांसे के बर्तन में घी भरकर व दक्षिणा रखकर (हो सके तो थोड़ा सोना भी रखें) ब्राह्मण को दान देने से मनुष्य ओजस्वी होता है ।

शरद पूर्णिमा की रात से ही आकाशदीप जलाया जाता है जो पूरे कार्तिक मास तक जलाया जाता है । आकाशदीप देवताओं की प्रसन्नता के लिए जलाया जाता है ।

आश्विन पूर्णिमा को ही कोजागर व्रत होता है । ऐसा माना जाता है कि इस दिन रात्रि में देवी महालक्ष्मी हाथों में वर तथा अभय धारण कर यह देखने के लिए पृथ्वी पर घूमती हैं कि ‘कौन जाग रहा है’ । जो जाग कर मेरी पूजा कर रहा है उसे धन देती हैं । इस व्रत में ऐरावत पर सवार इन्द्र व महालक्ष्मी का पूजन कर उपवास किया जाता है । लक्ष्मीजी की प्रतिमा को कांसे या मिट्टी के कलश पर स्थापित कर पूजन किया जाता है ।

रात्रि में सौ घी के दीये या अपनी सामर्थ्यानुसार घी के दीये बनाकर उनका रोली चावल से पूजन कर मन्दिर, तुलसी, बेल, अनार व पीपल के पेड़ के नीचे और घर पर रखें । इसके बाद घी और शक्कर मिलायी खीर बनाकर चन्द्रमा की चांदनी में रखें । फिर उस खीर को लक्ष्मीजी को अर्पण करें । रात भर मांगलिक गीत गाते हुए जागरण करें । इस व्रत से प्रसन्न होकर लक्ष्मीजी इस लोक में समृद्धि देती हैं और शरीर का अंत होने पर परलोक में सद्गति प्रदान करती हैं ।

इस दिन श्रीसूक्त या लक्ष्मीस्तोत्र का पाठ ब्राह्मण से करा कर कमलगट्टे, बेल या पंचमेवा या खीर से हवन कराना चाहिए ।

शरद पूर्णिमा को आरोग्य प्राप्ति के लिए करें ये उपाय।

शरद पूर्णिमा को सायंकाल खीर (यदि गाय के दूध की हो तो उत्तम है) बनाएं उसमें थोड़ा सा घी और सफेद खांड मिलाएं । एक चांदी के बर्तन (यदि चांदी का बर्तन नहीं है तो जो भी पात्र हो, लें) में रखकर भगवान को भोग लगायें ।

फिर उस खीर के पात्र को सफेद पतले मलमल के वस्त्र से ढक कर चन्द्रमा की चांदनी में रख दें । कुछ घण्टे या सारी रात खीर पर चन्द्रकिरणें का स्पर्श होने दें । इससे चन्द्रमा का अमृत और उसकी शीतलता उस खीर में प्रविष्ट होकर तन-मन को शान्ति, शीतलता व आरोग्य प्रदान करती है ।

नेत्र-ज्योति व स्मरण-शक्ति बढ़ाने के लिए इस दिन रात्रि को घी, बूरा और पिसी काली मिर्च मिलाकर जमा दें फिर चन्द्रमा की चांदनी में उस घी के मिश्रण को रख दें । रात भर चांदनी में रखे गये इस घी को रोज सुबह एक छोटा चम्मच खाने से मनुष्य की नेत्र-ज्योति व स्मरण-शक्ति बढ़ती है । विद्यार्थियों के लिए यह उपाय बहुत लाभदायक है ।

ऐसा माना जाता है कि इस दिन रात्रि में चन्द्रमा की रोशनी में सुई में धागा पिरोने से नेत्र ज्योति बढ़ती है ।

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